banglamukhi mandir muzaffarpur

 माँ बगलामुखी मंदिर

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बंगलामुखी मंदिर

शहर के कच्ची सराय  स्थित माँ बंगलामुखी मंदिर तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र मन जाता है । काहा जाता है कि 281 वर्ष पूर्व महंत अजित कुमार के परदादा प्रसाद ने इस मंदिर की स्थापना की थी । यह परिवार की वैशाली के महुआ आदलपुर से यहाँ  था । माता बंगलामुखी इस परिवार की कुलदेवी थी और उनकी इस परिवार पर असीम कृपा थी । कहते कई कि स्थापना से पूर्व रूपल प्रसाद ने कोल्कता के तन्तिक भवानी मिश्र से दीक्षा ली और उनकी प्रेरणा से मंदिर को स्थापित किया । वही के कलाकारों ने माँ  मूर्ति बनाई । मंदिर के वर्तमान स्वरुप के नींव 1993-94  महंत अजित कुमार ने रखी । इंजीनियरिंग की  अध्ययन बीच में ही छोडक़र उन्होंने अपनी माता कमला देवी से साधना सीखी । वाम मार्ग व दक्षिण मार्ग से उन्हें तांत्रिक चेतना जागृत हुई । धीरे धीरे तंत्र शक्तियों की साधना कारण मंदिर के प्रति लोगो के आस्था बढ़ती चली गई 2004 में माँ त्रिपुरसुंदरी व साधना कारन और 2006 में बाबा कालभैरव की प्रतिमा की प्राण – प्रतिष्ठा हुई । महंत ने बताया कि मंदिर के ढीक निचे सहस्त्र दाल महायंत्र स्थापित है | 

वर्षों पूर्व स्थापित हुआ माँ बगलामुखी मंदिर…..

शत्रुओं का नाश करने वाली माता बगलामुखी का मंदिर कच्ची सराय रोड स्थित है | नवरात्र हो या आम दिन यहाँ तांत्रिकों का मेला लगा रहता है| मंदिर में स्थापित माता की मूर्ति अष्टधातु की है जो दस भुजा स्वरुप में पञ्च प्रेतासन पर विराजमान है एवं श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है |इस मंदिर की स्थापना की कहानी काफी दिलचस्प है | यहाँ के महंत अजित कुमार प्रसाद के पूर्वजों ने इस मंदिर की स्थापना वर्षों पूर्व में की थी| माँ बगलामुखी कि मूर्ति के ठीक नीचे “सहस्त्र दल महायंत्र” स्थापित है |इस यन्त्र पर १०८ महाविद्याओं कि साधना कि जाती है | महंत बताते है की इस यन्त्र के कारण लोगों की कामना पूरी होती है एवं इसके दर्शन मात्र से मनुष्य का भाग्य बदल सकता है | नवरात्र में यहाँ देशभर से दर्जनों तांत्रिक साधना के लिए यहाँ जुटते हैं |

                   प्रसाद परिवार वैशाली के महुआ आदलपुर से मुजफ्फरपुर आया था | माता बगलामुखी इस परिवार की कुलदेवी थी और माता की असीम कृपा इस परिवार पर थी | प्रसाद परिवार के मुखिया रुदल प्रसाद वर्तमान में जहाँ मंदिर है, वहा घरेलु रूप से माँ की पूजा करते थे | महंत अजित कुमार बताते है की करीब ढाई सौ वर्ष पूर्व उनके परदादा रुदल प्रसाद ने ही मंदिर की स्थापना की थी | स्थापना के पूर्व रुदल प्रसाद ने कलकत्ता के तांत्रिक भवानी मिश्रा (गया निवासी) से गुरुमंत्र लिया| उन्ही की प्रेरणा से इसकी स्थापना हुई | मूर्ति का निर्माण कलकत्ता के कारीगरों ने किया |

                   मंदिर के वर्तमान स्वरुप की नीव वर्ष १९९३-९४ के बीच महंत अजित कुमार ने रखी | माँ कमला देवी से माता की साधना सीखी | उन्होंने वाम मार्ग व दक्षिण मार्ग से मंदिर में तांत्रिक चेतना जागृत की | धीरे धीरे तांत्रिक शक्तियों के कारण लोगों की आस्था इस मंदिर में बढ़ी और भीड़ जुटने लगी | इस मंदिर में माँ त्रिपुर सुंदरी और माँ तारा की मूर्ति २००४ और बाबा भैरव की मूर्ति २००६ में स्थापित हुई | माँ त्रिपुर सुंदरी कि मूर्ति के ठीक नीचे “श्री यन्त्र ” स्थापित है एवं माँ तारा जो नील सरस्वती स्वरुप में विराजमान है उनकी मूर्ति के ठीक नीचे “६४ दलयंत्र” स्थापित है.| साथ ही मंदिर प्रांगण में बजरंग बली, माँ काली की भी मूर्तियां स्थापित है | मंदिर प्रांगण में ही नरसिंह ब्रह्म और कैलाश ब्रह्म एवं महाकाल भैरव की विशेष पूजा की जाती है | मंदिर में दो विशाल हवन कुंड का भी निर्माण किया गया है जहाँ शमशान द्वारा विशेष वाममार्ग की साधना एवं महा यज्ञ किया जाता हैं |

                   कच्ची सराय रोड स्थित माँ बगलामुखी मंदिर जन आस्था का पवित्र केंद्र है | दुखों, संकटों और द्वंदों से मुक्ति के लिए श्रद्धालु आस्था से वशीभूत होकर यहाँ आते है और माँ बगलामुखी की पूजन करते है | माँ बगलामुखी सहस्त्रदल यन्त्र श्री विद्या यन्त्र के साथ यहाँ स्थापित है | हर गुरुवार को यहाँ काफी भीड़ जुटती हैं | माता को दही, हल्दी एवं दूभ चढाने से वो प्रसन्न होती हैं | चैत्र और शारदीय नवरात्र के अवसर पर यहाँ साधकों और उपासकों का तांता लगा रहता है | दोनों नवरात्रों के समय बिहार व अन्य राज्यों से सिद्धि प्राप्ति के लिए तांत्रिकों का जमावड़ा यहाँ लगता है |

                   शारदीय, वासंतीय नवरात्र एवं गुप्त नवरात्र में नौ दिन तक अखंड हवन यज्ञ का आयोजन एवं रात्रिकाल में महाकाल की विशेष साधना की जाती है | यहाँ तांत्रिक विधि से पूजन की जाती है जिससे सभी मनोवांछित कामनाओ की पूर्ति एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है | साथ ही चैत नवरात्र एवं आश्विन नवरात्र के अवसर पर नौ दिनों तक लंगर का आयोजन होता है और माता को खिचड़ी का महाभोग लगाया जाता है लोग दूर-दराज़ से आकार प्रसाद ग्रहण करते है |यहाँ माँ शीतला के स्थान पर मनोकामना पूर्ति हेतु माँ को चुनरी एवं मौली द्वारा मन्नत मांगी जाती है |

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